Saturday, 16 April 2016

ओ मेरा देश

        “ओ मेरा देश”
गरीब मुल्कों की लूट,उनकी खनिज संपदा की बंदरबाँट,बाजार पर  नियंत्रण बनाने की होड़ और सामरिक वर्चस्व बनाये रखने की प्रक्रिया में साम्राज्यवादी देशों ने युध्द को विकल्प के रूप में चुना है | वित्तीय पूँजी द्वारा तीसरी दुनिया को लूटने  के तरीकों से उन्हें संतोष नहीं है, इसलिए युध्द थोपे जा रहें हैं, जिनके माध्यम से कठपुतली सरकारें बनायी जा सके | इस क्रम में मनुष्य की त्रासदी, युध्द की विभीषिका में और ही गहन हो चली है ,जहाँ करोड़ों-करोड़ लोग तबाही और अँधेरे में धकेल दिये गये हैं | फिर भी मनुष्य उजाले के लिए लड़ रहा है|
उसकी जिजीविषा और सपने जिन्दा हैं | बमों के धमाकों के बीच भी बच्चे जन्मते हैं, हँसते हैं |माँए लोरियां सुनाती     



हुईं अपने देश को मुक्त कराने की चाह को मरने नहीं देतीं,जबकि वे खुद शहीद हो रही होती हैं|
    इराक और अफ़गानिस्तान के दृश्य-फलक को चित्रित करता यह रंगमंचीय नाटक “लोक-भाष” में व्यक्त होता है| नाटक में कथ्य-विस्तार के लिए कोरस का भी प्रयोग हुआ है, जिसके चलते “ओ मेरा देश” बहुआयामी रूप ले लेता है| नाटक में कहीं-कहीं कोलाज़ के रूप में कथ्य निरूपण “टाइम और स्पेस” के सापेक्षिक सन्दर्भों में अंतर्संबंधित दिखने लगते हैं और मनुष्य के वजूद का अर्थ स्पष्ट करता हैं|
      लेखकीय एवं निर्देशकीय - हरिवंश



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