Monday, 6 October 2025

मुझे विहंगम दृष्टि दो





मुझे विहंगम दृष्टि दो
तुम मेरी शब्द हो
कविता हो तुम 
तुम सो जाओ 
मैं देख रहा हूँ
तुम खिलता हुआ
कमल हो 
चमक हो 
मेरी रूह हो
तुम सांस लो
तुम ख़ुशबू हो
तुम मौन हो 
तुम सीख हो
तुम सत्य के 
धरातल पर
चमचमाती रेत हो
तुम धवल
तुम रूपसी
तुम शिवा 
तुम सुंदरी
तुम महक 
तुम आवाज़
तुम उमड़ता दरिया हो
तुम धूप, तुम छाया
तुम शिद्दत का सितारा 
मुझे विहंगम दृष्टि दो

✍️सुभाष कुमार

शेष-माह की मुस्कान प्रिय





शेष-माह की मुस्कान प्रिय

अब्बा की चहकती चिड़िया हो तुम
अम्मा की गुड़िया हो तुम प्रिये

शहर-ए-दिल की गलियाँ हो तुम
ग़ज़ल की दुनिया हो तुम प्रिय

जमाले-ए-दिलफ़रोज़ की सीरत हो तुम 
शरद ऋतु की मधुर प्रभा हो तुम प्रिय

दीप तले अंधकार की ज्योति हो तुम
शेष-माह की किरण हो तुम प्रिय

        ✍️ सुभाष कुमार  
(1.जमाले-ए-दिलफ़रोज़:- मनोहर करने वाला सौंदर्य, 2.शेष-माह:- चाँदनी रात।)


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