Saturday, 13 October 2018

"भूले हुए दिनों की बात करते हैं।"

"भूले हुए दिनों की बात करते हैं।"

चलो बचपन को याद करते हैं।
अपनी मर्जी की बात करते हैं।

तू तोतला मैं पोटला फिर से करते हैं।
गन्ना चवाकर कॉपी भूला घर चलते हैं।

धूप में  तालाब किनारे खेलते हैं।
लाल आँख, भीगे कपड़ों में घर चलते हैं।

दादा जी दरवाज़े पर बैठे हैं।
चकमा दे कर पीछे से घर चलते हैं।

शाम हुई, पढ़ाई अब करना है।
बस्ता-बिस्तर, ढूंढ़ कर आना है।

बार बार हवा को दोष दे कर लैंप बुझते हैं।
इस बात को गुरु जी भी समझते हैं।

हर पाँच मिनट में रसोई घर में झाँकते हैं।
भूख लगी, बहाना बना कर छुट्टी मंगते हैं।

रात होते ही दादी जी को खोजता हूँ।
आप किस्सा सुनाइए, मैं सोता हूँ।

भूले हुए दिनों की बात करते हैं।
चलो बचपन को याद करते हैं।

               ✍️सुभाष कुमार

Tuesday, 2 October 2018

हमरी वोटबा पर बइठले हो

का जुलूम किये रे
जो बंदूक उठइले हो

हमारी खेतबा के खा के
जो इ जुलूम कइले हो

  हमरी वोटबा पर बइठले हो
  तानाशाही में सभे जुटले हो

  बोली के जाल फइलेले हो
  हमरे तू पिटबइले हो

हमनी ना जरइबो हड़बा
तोहनी का खाइबो अलुहा

बहुते भइलो जुलुमबा
चालतो ना इ ससनाबा।
✍️सुभाष

पिंकी:- मैं और मेरा गुल्लक

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