"भूले हुए दिनों की बात करते हैं।"
चलो बचपन को याद करते हैं।
अपनी मर्जी की बात करते हैं।
तू तोतला मैं पोटला फिर से करते हैं।
गन्ना चवाकर कॉपी भूला घर चलते हैं।
धूप में तालाब किनारे खेलते हैं।
लाल आँख, भीगे कपड़ों में घर चलते हैं।
दादा जी दरवाज़े पर बैठे हैं।
चकमा दे कर पीछे से घर चलते हैं।
शाम हुई, पढ़ाई अब करना है।
बस्ता-बिस्तर, ढूंढ़ कर आना है।
बार बार हवा को दोष दे कर लैंप बुझते हैं।
इस बात को गुरु जी भी समझते हैं।
हर पाँच मिनट में रसोई घर में झाँकते हैं।
भूख लगी, बहाना बना कर छुट्टी मंगते हैं।
रात होते ही दादी जी को खोजता हूँ।
आप किस्सा सुनाइए, मैं सोता हूँ।
भूले हुए दिनों की बात करते हैं।
चलो बचपन को याद करते हैं।
✍️सुभाष कुमार