Sunday, 8 March 2026

पिंकी:- मैं और मेरा गुल्लक

 आज महिला दिवस है आप सभी महिलाओं को इस दिवस की शुभकामनाएं को साथ मेरा नाटक इसी विषय पर आधारित है देखिये इस दृश्य को शब्द के माध्यम से....

(मंच पर धीमा प्रकाश हैं... पिंकी अपनी तीन गुल्लक लेकर बैठी है, तीनो गुल्लक का रंग अलग अलग है... वो अपनी तीनों गुल्लक को सहेजते हुआ ... संवाद बोलती है। संवाद बोलते समय अपनी भाव भंगिमा बिभिन्न प्रकार बदलती रहती है।)

 पिंकी:-  मैं और मेरा गुल्लक, जैसे जैसे मैं बड़ी होती गई, वैसे वैसे मेरे गुल्लक में पैसा बढ़ते गया।  इसके बढ़ने का कारण यह है कि मुझे बहुत दूर जाना है, हाँ इसे कारण ही क्यों कहूँ, ये मेरी उपलब्धि है। ना जाने क्यों मुझे हर बात कारण सी लगने लगती है। शायद ये भी मुझे आप लोगों से ही मिल रही है।
मैं बहुत नटखट और शरारती हूँ, क्या मैं अब भी हूँ या पहले था, शायद आप समझ नही रहे हैं, खैर छोड़िए । वैसे हम भी आप के तरह पढ़ना चाहती हूं, काम करना चाहती हूँ। मुझे नही चाहिए इसी उम्र में जिम्मेवारी, उन कामो की जो आपके मन में है। और आपके मन में क्या है ओ आप जानते हैं, मैं जिम्मेवारी से पीछे नही हट रही हूँ मुझे चाहिए पर अपनी पसंद की जो मैं करना चाहती हूँ, 
आप भरोसा कीजिये मैं आप जैसा ही करना चाहती हूं , मुझे सेल्फ डिपेंड होना है। बट हमारे पैरेंट की प्रतिष्ठा प्यारी है, अगर मैं शहर जकर आगे की पढ़ाई करने चाहती हूं तो इसमें हमारे गाँव समाज , परिवार क्यों नही जाने दे रहे हैं , पता है आपको ? नही मैं बताती हूँ... हम लड़कीयां आपके लिए नाक हैं, इज़्जत हैं ... हाँ मैं हूँ आपके लिए  ... आपकी मान, मर्यादा , शाख ... लेकिन पितृसत्तात्मक सोच आपको अपने काबू में है। क्या आपको मालूम है...
हमारे समाज में बढ़ते विकृतियां और विछिप्त  मानवता वाले लोग की बढ़ोतरी काफी हो रही है । मनुष्य की मानसिकता में नकारात्मकता की इतना उपज हो रहा है, कि वह खुद को नहीं पहचान रहे हैं! वो कहीं न कहीं खो रहे हैं। इसका कारण यह है कि हमारे समाज में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, बलात्कार जैसी घटनाओं का अंजाम दे रहे हैं। हम भूल गए हैं कि हमारी संस्कृति, हमारी परंपरा क्या था। हम क्या जानते थे, क्या पढ़ते थे , क्या सोचते थे, लेकिन इन सभी विशेषताओं से दूर दूर भागते आज हमारा समाज किस ओर जा रहा है।
ख़ैर  इन सब बातों से आपको कोई फर्क नही पड़ने वाला नही हैं। रही बात मेरी , मैं तो अब रुकने वाली नही हूँ... चाहे मुझे अपने कैरियर के लिए जो भी करना होगा वो मैं करने के लिए तैयार हूँ..।

(प्रकाश धीरे धीरे कम हो जाता है... संगीत तेज होता है। दृश्य ओझल हो जाता है।)
  ✍️ सुभाष कुमार

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पिंकी:- मैं और मेरा गुल्लक

  आज महिला दिवस है आप सभी महिलाओं को इस दिवस की शुभकामनाएं को साथ मेरा नाटक इसी विषय पर आधारित है देखिये इस दृश्य को शब्द के माध्यम से.... ...