लॉकडाउन रेडियो
'लघुकथा'
✍️ सुभाष कुमार
हाथ-पैर को रस्सी से बांधकर और मुह में जाब लगा
कर, एकदम एकांत में बैठ गया। ऐसे बैठे की जैसे मेरे गांव में कोठी ताखी(अनाज रखने वाला मिट्टी की बड़ी सी बर्तन)पर
रेडियो बैठा रहता था। वो सिर्फ टुकुर-टुकुर देख रहा था केवल, बोल कुछ
नहीं सकता। ठीक उसी प्रकार,
जिस प्रकार मैं यहाँ अकेले हूँ। एक समय था जब हमलोग, मैं नही हमलोग घड़-घड़... चिक-चिक करते
रेडियो पर खबरें सुनते थे। अब टाइम बदल गया है, आधुनिक
तकनीक और डिजिटल के दौर में सारी दुनिया हाथ मे हैं, मेरे पास भी कभी था। जब अपने गांव से शहर आना था तो उस मोबाइ
को बेचना पड़ा, वज़ह भाड़ा उसी से निकला था। अब यहाँ एक
फैक्टरी में नौकरी लगी, अब दो महीने में फिर से मोबाइल लेना
संभव नही है। और इसी बीच दुनिया मे भाड़ी प्रलय आ गया।
जब कुछ
देखना होता है, तो किसी दुनाक में चलती टीवी को दूर से
ही झांक कर देख लेता हूँ,
देखता तो हूँ, लेकिन समझ में नही आता है। लगता है कि
19वीं सदी के महान निर्माता श्री बी आर
चोपड़ा का शो 'महाभारत' से भी बढ़ कर एकदम आक्रमण-आक्रमण भी फेल है। मन खिन्न हो जाता है। यही सोच रहा था... तभी
सामने से सिंटू अपना झबर्ल बाल से ढका हुआ कान में डब्बा जैसा संगीत यन्त्र लगाए
पधारे।
मैंने
जैसे ही उससे पूछा भइया कल भर ही बंद था सब ...तो आज भी लोग सड़क पर नही दिख रहे
हैं ? मेरी बात ख़त्म भी नही हुई थी सिंटू
टपाक से बोला...चाचा अब 31 अप्रैल तक सब बन्द , सुनते मेरा दिमाग सन्न हो गया! अब मेरे
आगे खड़ा सिंटू कब गायब हो गया मुझे पता ही नही चला। मैं बेसुध हो गया था। तभी मेरा टून टूनहा मोबाइल
में रिंग बजा 'सारे जहाँ से अच्छा ... हिन्दोस्तां
हमारा ...' मैं फ़ोन में हेलो मात्र बोला, तभी उधर से आवाज़ आई, सुनिए, आपके पास रुपया-पैसा जो है, उसका
आटा, दाल, चावल, आलू, मसाला और तेल ले लीजिए, घटेगा
तो और किसी से उधर भी ले लीजिएगा..! ज्यादा घुमान नही है। पान, बीड़ी, आ ऊ का है जो आप खाते हैं ... हाँजी, केसर वाला पुड़िया नही खाना है, समझें... बोलिए कुछ, हूँ हूँ, का कर रहे हैं! अब मैं क्या
बोलता बस सुने जा रहा था,
देखिए 21 दिन का ही बात है सब ठीक हो जायेगा समझें, मैं इतना सुना ही था कि मेरा दिमाग
मुझे ये समझा रहा था। देखो मंगरु तुमसे ज्यादा समझदार है तेरी औरत, हाँ सुनिए खाना पर ध्यान देना है। हम
फ़ोन रख रहे हैं, माई बोला रही है। कहते फ़ोन टूँ...
टूँ... करने लगा।
हाथ में आलू लिए चल दिए अपना आशियाना की ओर, मन में और कुछ नही बस यही चल रहा था कि ऐसा समय मेरे बाप का बाप भी
नही देखें होंगें। कमरा में बैठे-बैठे शाम हो गया, खाना पकाया,
खाया ... सुबह हुआ... दोपहर हुआ, शाम हुई...समय काटे काट नही रह था। फिर
अकेले रहना बहुत तकलीफ जैसा होता है। आज लगा रहा मेरे पास रेडियो का न होना कितना
अखरता है। मुझे उस दिन की याद दिला दिया जिस दिन रेडियो पर बीबीसी का समाचार और
उसके बाद हवामहल जो सुनते थे बुचन काका के दालान पर, ओहोहो... क्या नाटक आता था ।
कभी कभी तो रेडियो में बैट्री नही होता तो काका अपने से नाटक , क़िस्सा, सुनने लगते
थे। ऐसे सुनाते थे जैसे वो नाटक सुना नही रहे हैं मानो वो खुदे कर के दिखा रहे
हैं..। बात बात पर काका तन जाते और ठहाका मार कर हँसाते, रोते और गाते भी, सभी का मन भाव-विभोर हो जाता। अब तो
काका जैसा गीत गवाया को सुना वर्षों बीत गया।
अब इस लॉकडाउन में रेडियो होता तो शायद समय का
पता नहीं चलता, खैर कोई बात नहीं। सोते- जागते आज पूरे 20 दिन बीत गया...अब मन थोड़ा हल्का सा लग
रहा था। 20- 22 दिन और काट ही जाएगा..। पूरी दुनिया
में संकट है महामारी(कोरोना covid-19) का , मैं अकेला तो नही हूँ। मेरे जैसे
सैकड़ों मज़दूर भाई लोगो बेबस,जो
दिन भर काम करने वाले आज अपने और अपने परिवार के लिए भूखें, बैठा हुआ है। हाँ बैठने से एक बात याद
आई..!
एकबार
मेरे गाँव में राजा साहब के खेत में काम करता सभी मज़दूर आपस में बात कर रहे था, की कौन मालिक होगा जो बैठाकर मज़दूरी
देगा। ये बात राजा जी सुन लिए, अगले
दिन सभी मज़दूर को राजा साहब वो राजशाही भोजन खिला कर उसको आराम करने और सोने के लिए बोल देते हैं, अब तो सभी का जान उस कैदी जैसा था, कि अब सिर्फ ज़िन्दा रहने है की
दुहाइयाँ कर रहा हो भगवान से ... लेकिन शाम होते ही राजा साहब सभी मज़दूर को उस दिन
का मेहनताना और दिने के जैसा ही दिएँ। ये बात मेरे बाबा सुनाएँ थे बचपन में, अब
मुझे भी इस तरह का कुछ महसूस हो रहा है । लेकिन मज़दूरी कौन देगा उस दिन
जैसा बैठकर !
अब
मन तो उस मदारी के बंदर जैसा कर रहा है कि रस्सी से बंधा हुआ हूँ। सिर्फ मदारी के
सिर, कंधा के अलावा ज़मीन पर उसी के
इर्दगिर्द रहना होता है। खैर आज रोजीरोटी अपने
गाँव घर मे होता तो आज यह दिन नही देखना होता। अगर सकुशल बच गए इस महामारी
से तो मैं रेडियो जरूर ख़रीदूँगा।
