Thursday, 19 December 2019
Saturday, 27 July 2019
Tuesday, 23 July 2019
Sunday, 14 July 2019
रश्में मोहब्बत भी क्या खूब है।
Wednesday, 5 June 2019
Saturday, 25 May 2019
इश्क़ इत्तिफ़ाक़ नहीं
मंजूरी है, क़िस्मत की
मंजूरी है, सब्र की
मंजूरी है, महबूबा की
मंजूरी है, समर्पण की
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Sunday, 19 May 2019
Wednesday, 17 April 2019
मुझे नींद नही आती
सोता तो शरीर है
नींद में भी नींद
मुझे नींद आती
कैसे सुनाऊ
अपना हाल-ए-बयां
तुझे ढूढ़ती हैं
मेरी निगाहें
हर वक्त बेवक्त
ख्वाहिशों के
समंदर में
इक मोती हैं
तेरे नाम का
उसे पाने की चाहत
में खुद को गांवा बैठा हूँ
मुझे नींद नहीं आती
सोता तो शरीर है
नींद में भी नींद
मुझे नहीं आती...
Friday, 15 March 2019
कुछ नई शुरुआत कर
साथ साथ चल
शुरुआत कर
ठहराव जो है,
उसमें जज़्बात भर
और कुछ बात कर
सदियों से चली
परंपरा को, अहिवात कर
एक नहीं, सौ नई बात कर
कर तुम अपनी बात कर
कर बात इस कदर
कुछ तो नई, शुरुआत कर
मान को सम्मान कर
गर हो कोई, सारथी
उस पर तुम अभिमान कर
संग संग मिल
साथ साथ चल
कुछ तो नई
शुरुआत कर ...
✍️ सुभाष कुमार
Tuesday, 5 March 2019
Saturday, 26 January 2019
"अश्क को संभाले रखना"
तेरे मेरे बीच का जो बंधन है
उस बंधन में जो स्पंदन है
उसको महसूस करना चाहता हूँ
फासला हुआ तो इश्क ने
मुझ से ही मुझको दूर कर दिया
अब मज़बूर हूँ, मैं वो नहीं जानती
जो बातें होती थी कल को
तुम खुश हो आज में
कसक नही है दिल में
रोने मत देना दिल को
अश्क को संभाले रखना
काम आएगा जीने को
✍️सुभाष कुमार
Sunday, 6 January 2019
सुभाष कुमार के निर्देशन में नाटक इन्क़लाब ज़िन्दाबाद का मंचन
आज की प्रस्तुति....
#NIT_GHAT_PATNA
परिकल्पना मंच की प्रस्तुति-
नाटक - इन्क़लाब ज़िन्दाबाद
आलेख - गुरुसरण सिंह
निर्देशक - सुभाष कुमार
-------- कथासार-------
गुलाम भारत और अंग्रेज सरकार की हुकूमत के दौर में देश को आज़ाद होने तक कि जो कहानी है। जिसमे हम आज़ाद तो हैं, परंतु आज़ादी का क्या मतलब होता है! इसके चित्रण किया गया है। क्रांतिकरी भगत सिंह और उनकी साथियों ने जो देश के लिए जिस तरह से अपनी कुर्बानी दी उसका प्रभाव पूरे भारत मे बच्चा बच्चा उनके रास्ते पर चलने को राजी हो गया और देश को एक अलग क्रंति की राह दे दी।
"सरफ़रोशी की तम्मना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाजुए कातिल में है"
देश को आज़ाद हुए आज 71 साल हो गया, लेकिन देश मे अभी भी ज्यादा बदलाव नही हुई। एक तरफ गरीब और गरीब होते चला गया और अमीर और अमीर होते चला गया। किसान, मज़दूर की वही रूप आज भी है देश मे, जिसके कारण आज भी किसान आत्महत्य कर रहे हैं! 12 से 16 घण्टे की जी तोड़ मेहनत करने के बाद भी मज़दूर भर पेट भोजन नही कर पाता और अपने बच्चों को शिक्षा भी नही दे पाता है। हिंदुस्तान आज भी जंजीर में जकड़ा हुआ प्रतीत होता है। इस बेड़ियों को तोड़ने के लिए आज भी युवा वर्ग की संघर्ष जारी है। एक खुशहाल हिंदुस्तान के सपने को संजोए रखा है।
नाट्य कलाकार-
दीपक कुमार
दिग्विजय तिवारी
प्रदुमन
लवकुश
निशांत
विवेक
अन्य -राजवीर, राज शेखर,सुदीप कुमार,लाडली, रूबी,सुशील,राहुल
संगीत - हीरा लाल रॉय,विवेकानंद पांडेय
प्रस्तुति संयोजन - यशवंत मिश्रा
पिंकी:- मैं और मेरा गुल्लक
आज महिला दिवस है आप सभी महिलाओं को इस दिवस की शुभकामनाएं को साथ मेरा नाटक इसी विषय पर आधारित है देखिये इस दृश्य को शब्द के माध्यम से.... ...
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हर इंसान के पास अपनी दृष्टि होती है। दुनिया को देखने का अपना नजरिया होता है। कलाकारों कि जो दृष्टि होती है, वह औरों से अलग होती है। यह अन...
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तेरे इश्क़ में, मैं इराक हुआ तेरे इश्क़ में, मैं इराक हुआ बैसाख में जल कर, ख़ाक हुआ। तुमने क्या जलवा दिखा गई भूल गया...
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मैं शहर गया वहां ज़हर लिया फिर उसको थोड़ा सा लिया उसका असर मेरे पर न हुआ, कसर उस शहर में था जो आसपास के शहर में हुआ ज़हर का चर्चा ...










