Thursday, 19 December 2019

चरित्र



'चरित्र ही आपका चित्र है
चित्र जितना आकर्षक होगा
चरित्र उतना ही उत्कृष्ट रहेगा.'
✍️ सुभाष कुमार

Saturday, 27 July 2019

पटना की शाम...❤️

                                                    पटना की शाम...❤️

बारिश की मदमस्त बूंदे
जैसे ये मौसम सुहाना हुआ
धीमी धीमी पवन चले
देख मन मदमस्त हुआ
झिलमिल झिलमिल रौशनी
ये देख मन उल्लसित हुआ
सावन की भीगी भीगी बूंदे
ये देख यौवन दीवाना हुआ

✍️ सुभाष कुमार

Tuesday, 23 July 2019

ख़्यालों की कश्ती में




ख़्यालों की कश्ती में 
मैं सवार हो कर ....
सपनों के लहरों में
अपनों की चाहत में 
गैरों की बस्ती में...
मंज़िल की आस मे
मस्ती उधार ले कर...
मैं चल पड़ा हूँ...

 ✍️सुभाष कुमार

Sunday, 14 July 2019

रश्में मोहब्बत भी क्या खूब है।

       




रश्में मोहब्बत भी क्या  खूब है।

तहज़ीब की बातें भी क्या खूब है।

मैं,तुम की बातें भी क्या खूब है।

दस्तूर दुनिया भी क्या खूब है।

रश्में समाज भी क्या खूब है।

इनके संस्कार  भी क्या खूब है।

मैं, तुम और वादें भी क्या खूब है।

हसरतें मुकाम भी क्या खूब है।

रश्में रिवाज़ भी क्या खूब है।

परवरिशें बंधन भी क्या खूब है।

✍️ सुभाष कुमार

Wednesday, 5 June 2019

औरों के जेहन में  हो

औरों के जेहन में  हो
   

तुम भटक गए हो
कि औरों के नज़र में हो
तुम समझ गए हो
कि औरों के असर में हो
तुम सो गए हो
कि औरों के खोज में हो
तुम सपन में हो
कि औरों के जेहन में  हो
      ✍️ सुभाष कुमार

Saturday, 25 May 2019

इश्क़ इत्तिफ़ाक़ नहीं

इश्क़ इत्तेफाक़ नहीं


इश्क़ इत्तेफाक़ नहीं
इश्क़ इत्तेफाक़ नहीं
मंजूरी है, क़िस्मत की
इश्क़ इम्तहाँ नहीं
मंजूरी है, सब्र की
इश्क़ रोग नहीं
मंजूरी है, महबूबा की
इश्क़ बन्धन नहीं
मंजूरी है, समर्पण की
✍️सुभाष कुमार


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Sunday, 19 May 2019

एक-दूसरे की यार हो तुम

धुनकी साबर है कुछ कर दूँ
देश की  तस्वीर बदल दूँ।
नफ़रत की सारी दीवार गिरा दूँ
महफ़िल को भी ये बतला दूँ।
घोटाले करने की सारी हदें बतला दूँ
एक-दूसरे की यार हो तुम तुझे बता दूँ।
प्रतिनिधि को उसमें उसीको दिखला दूँ
ज़हर जो  फैलाया है उसे ही पिला दूँ।
        ✍️ सुभाष कुमार

Wednesday, 17 April 2019

मुझे नींद नही आती

                         मुझे नींद नही आती

मुझे नींद नही आती
मुझे नींद नही आती
सोता तो शरीर है
नींद में भी नींद
मुझे नींद आती
कैसे सुनाऊ
अपना हाल-ए-बयां
तुझे ढूढ़ती हैं
मेरी निगाहें
हर वक्त बेवक्त
ख्वाहिशों के
समंदर में
इक मोती हैं
तेरे नाम का
उसे पाने की चाहत
में खुद को गांवा बैठा हूँ
मुझे नींद नहीं आती
सोता तो शरीर है
नींद में भी नींद
मुझे नहीं आती...
✍️ सुभाष कुमार


Friday, 15 March 2019

कुछ नई शुरुआत कर

'कुछ नई शुरुआत कर'
संग संग मिल
साथ साथ चल
शुरुआत कर
ठहराव जो है,
उसमें जज़्बात भर
और कुछ बात कर
सदियों से चली
परंपरा को, अहिवात कर
एक नहीं, सौ नई बात कर
कर तुम अपनी बात कर
कर बात इस कदर
कुछ तो नई, शुरुआत कर
मान को सम्मान कर
गर हो कोई, सारथी
उस पर तुम अभिमान कर
संग संग मिल
साथ साथ चल
कुछ तो नई
शुरुआत कर ...

    ✍️ सुभाष कुमार

Tuesday, 5 March 2019

'क्या लिखूँ समझदारी'



क्या लिखूँ समझदारी

क्या करूँ जिम्मेवारी, जवाबदेही
होती जा रही है।
क्या लिखूँ जानकारी, तबाही
होती जा रही है।
क्या पढ़ूँ समझदारी, बेकारी
होती जा रही है।
क्या बनाऊँ स्वाद, बेस्वाद
होते जा रहा है।
क्या दिखाऊं कलाकारी, नदारद
होती जा रही है।
 
    ✍️सुभाष कुमार

Saturday, 26 January 2019

"अश्क को संभाले रखना"

         
महसूस करना चाहता हूँ
तेरे मेरे बीच का जो बंधन है
उस बंधन में जो स्पंदन है
उसको महसूस करना चाहता हूँ
इश्क क्या है, मैं नहीं जानता
फासला हुआ तो इश्क ने
मुझ से ही मुझको दूर कर दिया
अब मज़बूर हूँ, मैं वो नहीं जानती
कैसे भूलूँ उस पल को
जो बातें होती थी कल को
तुम  खुश  हो  आज  में
कसक नही  है  दिल  में
मन करे रोने का तो रो लो
रोने मत देना दिल को
अश्क को संभाले रखना
काम आएगा जीने को
    ✍️सुभाष कुमार

Sunday, 6 January 2019

सुभाष कुमार के निर्देशन में नाटक इन्क़लाब ज़िन्दाबाद का मंचन

आज की प्रस्तुति....
#NIT_GHAT_PATNA
परिकल्पना मंच की प्रस्तुति-
नाटक - इन्क़लाब ज़िन्दाबाद
आलेख - गुरुसरण सिंह
निर्देशक - सुभाष कुमार
  
-------- कथासार-------
गुलाम भारत और अंग्रेज सरकार की हुकूमत के दौर में देश को आज़ाद होने तक कि जो कहानी है। जिसमे हम आज़ाद तो हैं, परंतु आज़ादी का क्या मतलब होता है!  इसके चित्रण किया गया है। क्रांतिकरी भगत सिंह और उनकी साथियों ने जो देश के लिए जिस तरह से अपनी कुर्बानी दी उसका प्रभाव पूरे भारत मे बच्चा बच्चा उनके रास्ते पर चलने को राजी हो गया और देश को एक अलग क्रंति की राह दे दी।

"सरफ़रोशी की तम्मना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाजुए कातिल में है"

   देश को आज़ाद हुए आज 71 साल हो गया, लेकिन देश मे अभी भी ज्यादा बदलाव नही हुई।  एक तरफ गरीब और गरीब होते चला गया और अमीर और अमीर होते चला गया। किसान, मज़दूर की वही रूप आज भी है देश मे, जिसके कारण आज भी किसान आत्महत्य कर रहे हैं! 12 से 16 घण्टे की जी तोड़ मेहनत करने के बाद भी मज़दूर भर पेट भोजन नही कर पाता और अपने बच्चों को शिक्षा भी नही दे पाता है। हिंदुस्तान आज भी जंजीर में जकड़ा हुआ प्रतीत होता है। इस बेड़ियों को तोड़ने के लिए आज भी युवा वर्ग की संघर्ष जारी है। एक खुशहाल हिंदुस्तान के सपने को संजोए रखा है।

नाट्य कलाकार-
दीपक कुमार
दिग्विजय तिवारी
प्रदुमन
लवकुश
निशांत
विवेक
अन्य -राजवीर, राज शेखर,सुदीप कुमार,लाडली, रूबी,सुशील,राहुल
संगीत - हीरा लाल रॉय,विवेकानंद पांडेय
प्रस्तुति संयोजन - यशवंत मिश्रा

पिंकी:- मैं और मेरा गुल्लक

  आज महिला दिवस है आप सभी महिलाओं को इस दिवस की शुभकामनाएं को साथ मेरा नाटक इसी विषय पर आधारित है देखिये इस दृश्य को शब्द के माध्यम से.... ...