#वर्ष_कि_विदाई
रिश्ते भी अजीब होते हैं
कुछ खास होते हैं
कुछ बकवास होते हैं
कुछ जुड़ जाते हैं
कुछ टूट जाते हैं
कुछ ऐसे भी होते हैं
न ही जुड़ते हैं
और न ही टूटते हैं...
✍️ सुभाष कुमार
#वर्ष_कि_विदाई
रिश्ते भी अजीब होते हैं
कुछ खास होते हैं
कुछ बकवास होते हैं
कुछ जुड़ जाते हैं
कुछ टूट जाते हैं
कुछ ऐसे भी होते हैं
न ही जुड़ते हैं
और न ही टूटते हैं...
✍️ सुभाष कुमार
तुम जो आ जाते एक बार
इस जहां को देख जाते एक बार।
युग-युग की कथाएं, सुन जाते एक बार
जो तुम आ जाते एक बार।
मन चंचल है, उसको भा जाते एक बार
पथ-पथिकों , में समा जाते एक बार
इस नयन को, भा जाते एक बार।
इस फरिश्तों के जहां में...
अपना बनाते जो एक बार
नदियां, पहाड़, जंगल
पावन धरती को , भा जाते एक बार
जो तुम आ जाते एक बार।
✍ सुभाष कुमार
"मज़हवी फ़रमान में क्यों उलझ रही ज़िन्दगी"
अनचाही रफ्तार से भाग रही क्युँ जिंदगी
आस- पास कि कुछ याद ही नहीं जिंदगी
इस भीड़ में किसे तालाश रही ऐ जिंदगी
अपनों से दूर किस आस में है ज़िन्दगी।
जो उमंग पल रही थी, मन में ए ज़िन्दगी
उसे भूल वजूदों में क्या ढूंढ रही ऐ जिंदगी।
फ़िजूल की बातें को क्यों सुन रही है ज़िन्दगी
मज़हवी फ़रमान में क्यों उलझ रही ज़िन्दगी।
नफ़रत के दौड़ में तू शामिल क्यों है ज़िन्दगी
प्यार की परवरिश में तू आगे बढ़ ए ज़िन्दगी।
अपनी मुक़ाम को साकार कर ए ज़िन्दगी
अपने हुनर को सम्मान कर ए ज़िन्दगी।
✍️सुभाष कुमार
आज महिला दिवस है आप सभी महिलाओं को इस दिवस की शुभकामनाएं को साथ मेरा नाटक इसी विषय पर आधारित है देखिये इस दृश्य को शब्द के माध्यम से.... ...