Wednesday, 27 June 2018

लोक कलाकार व रंगमंच

हर इंसान के पास अपनी दृष्टि होती है। दुनिया को देखने का अपना नजरिया होता है। कलाकारों कि जो दृष्टि होती है, वह औरों से अलग होती है। यह अनोखी दृष्टि ही उसकी ताकत होती है। जिंदगी में जो अनुभव मिलता है, उसे वह रंगभाषा, रंगशैली के रूप में सामने लाता है। या यूं कहिए कि इसी से वह नई रंगभाषा, नई रंगशैली का निर्माण करता है
 हर रंगमंच का अपना एक संसार होता है। अपने दर्शक होते हैं। अपनी शैली होती है। शेक्सपियर के नाटकों की अपनी शैली है, अपने दर्शक हैं, तो बिहार के गांव में हो रहे नाटकों की अपनी शैली है, अपने दर्शक हैं। लोक रंगमंच के कलाकारों ने अपने लोग को अपने रंगमंच में समाहित किया है। या यूं कहिए कि लोक कलाकार अपने जीवन में जो देखते- भोगते हैं, उसे ही मंच पर उतारते हैं। उस प्रस्तुति में उनकी मिट्टी से जुड़ी हर वह चीज शामिल होती है और यही नहीं उनकी पहचान भी बन जाती है।
हमारा देश विविधताओं से भरा है। लेकिन हर क्षेत्र का अपना एक रंगमंच है जिसे लोग रंगमंच भी कह सकते हैं। समय का पहिया घूमता रहता है। एक दौर था जब शहरों में पारसी नाटकों की नाटकों की धूम होती थी। अंग्रेजी नाटक भी खूब खेले जाते थे। सिर्फ एलीट क्लास के लोग ही नाटक का लुफ्त उठाते थे। लेकिन समय का चक्र बदला और धीरे-धीरे लोक नाट्य मुख्य मंच पर आने लगा। गांव के कलाकार अपने नाटकों, अपनी शैली के साथ शहर के मंच पर दस्तक देने लगे। बाद में तो शहरी कलाकार भी लोकनाट्य को शहरी मंच पर जीवंत करने लगे। कभी इसी बिहार में भिखारी ठाकुर का नाटक सिर्फ गांव तक सीमित रहता था, लेकिन आज यह पटना से लेकर दिल्ली मॉरीशस तक चर्चित है।
    गोड़बा में जूता नईखे,
    सिरब पे छतबा  ऐ सजनी
पियबा गइलन कलकताव ऐ सजनी...
आज हर किसी को पसंद आ रहा है। पूरी ठसक के साथ शहरी रंगमंच पर भिखारी ठाकुर जीवित हो रहे हैं। भिखारी ठाकुर का बिदेसिया तो एक उदाहरण भर है, ढेर सारे नाटक हैं जो पूरी तरह गांव की जिंदगी पर केंद्रित है और इन नाटकों को आज के कलाकार पूरी शिद्दत के साथ शहरी मंच पर उतार रहे हैं।


   सिर्फ नाटकों में ही नहीं बल्कि लोग जीवन के दूसरे नायकों की जिंदगी भी मंच पर उतारे जा रहे हैं। फिर चाहे वह जिस रूप में हो । राजा-सलहेस,सामा-चकेवा,हिरनी-बिरनी, सती-बिहुला,शीत-बसंत, कौवा हकनि आदि भी आज मंच पर प्रमुखता के साथ उभारे जा रहे हैं। इससे हमारा लोक रंगमंच निश्चित रुप से समृद्ध हो रहा है।  मगर दुख इस बात का है कि लोक रंगमंच से जुड़े कलाकारों की स्थिति ठीक नहीं है। लोक रंगमंच समृद्ध है, मगर कलाकार बेबस नजर आते हैं।
खासकर बिहार में तो स्थिति अजीब है। सूबे में कितने लोग कलाकार हैं, इसका डॉक्यूमेंटेशन आज तक नहीं हो पाया है। उपेंद्र महारथी शिल्प संस्थान चाक्षुष कला के कलाकारों का डॉक्यूमेंटेशन जरूर कराया है,लेकिन लोक नाट्य,लोक नृत्य, लोक गायन के कलाकारों का आज तक डॉक्यूमेंटेशन नहीं हुआ है।  इससे जाहिर होता है कि हम अपनी लोक कला और कलाकारों के प्रति कितने गंभीर हैं। बिहार में संगीत नाटक अकादमी बना दी गई।  लेकिन नाट्य आदमी अपने गठन से लेकर आज तक यह कार्य क्यों नहीं करा पायी, यह समझ से परे है। गांव में रहने वाले कलाकार अपनी जिंदगी को कैसे चला रहे हैं, इसकी चिंता ही नहीं दिखती। जब बिहार गौरव की बात होती है, तो अपनी इन्हीं कलाओं और कलाकारों को लेकर हम दुनिया भर जाते हैं, लेकिन घर आते ही सब कुछ भूल जाते हैं।आखिर ऐसा क्यों?
     लोक कलाओं के विलुप्त होने की बातें लगातार सुनने को मिल रही है। मगर इस बात को लेकर कभी गंभीर पहल नहीं होती है। दीना-भद्री एक उदाहरण है, जो पूरी तरह विलुप्त होने के कगार पर है। दलित समुदाय का यह लोकनृत्य आखिर इस स्थिति में क्यों  पहुंचा? इसके सामाजिक और आर्थिक दोनों पहलू हो सकते हैं। सामाजिक पहलू यह है कि यह दलित समुदाय का लोक नृत्य है यानी एक ऐसा समुदाय जो शुरू से हाशिए पर रहा आर्थिक पहलू यह है कि इसके कलाकार शुरू से गरीब रहे और समय के साथ अपनी विधा का प्रचार-प्रसार नहीं कर सके और ना ही इन्हें बड़े मंच पर ले जाने का मौका मिला। ऐसे में कोई कला कैसे जीवित रह सकती है।
 आधुनिकता के इस दौर में हर इंसान को सब कुछ झटपट चाहिए। मनोरंजन भी फटाफट। फिर वह चाहे जैसा भी हो। आर्केस्ट्रा इसी का उदाहरण है। हम अश्लील गीतों पर नाचने के लिए तैयार हैं । मगर अपनी मिट्टी से जुड़ी चीजों को देखने के लिए नहीं बन रहा है। तमाम बातों के बीच में यह बात जरूर राहत देती है कि इस दौर में कुछ ऐसे कलाकार है जो अपनी विरासत को किसी न किसी रूप में सज रहे हैं। अपने लोक रंगमंच को जीवित कर रहे हैं। खासकर पटना रंगमंच के कलाकार इसमें आगे हैं।  गांव के लोक रंग को शहर में लाकर प्रमुखता से दिखा रहे हैं। लोक रंगमंच ऐसे ही प्रयासों से आगे बढ़ेगा और जीवित रहेगा।
    ✍️सुभाष कुमार

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