मुझे विहंगम दृष्टि दो
तुम मेरी शब्द हो
कविता हो तुम
तुम सो जाओ
मैं देख रहा हूँ
तुम खिलता हुआ
कमल हो
चमक हो
मेरी रूह हो
तुम सांस लो
तुम ख़ुशबू हो
तुम मौन हो
तुम सीख हो
तुम सत्य के
धरातल पर
चमचमाती रेत हो
तुम धवल
तुम रूपसी
तुम शिवा
तुम सुंदरी
तुम महक
तुम आवाज़
तुम उमड़ता दरिया हो
तुम धूप, तुम छाया
तुम शिद्दत का सितारा
मुझे विहंगम दृष्टि दो
✍️सुभाष कुमार

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