Sunday, 26 August 2018

बिदेसिया

             "बिदेसिया"

         'नाटक का कथासार'

      आलेख :- भिखारी ठाकुर
    
गााँव का एक यवुक। मझोला कद, गेंहुआ रंग, धोती-कुरता और टोपी पहनावा। खतेतहर मजदरू। वर्ष के कुछ ही ददनों काम भमलता है, शेर् समय में बेरोजगार रहता है। उसकी शादी एक सााँवली-सलोनी सदुंर यवुती से हो जाती है।विवाह के कुछ दिनों बाद वह यवुक अपनी प्यारी पत्नी  का गवना करा कर अपने घर ले आता है। पति-पत्नी में बहुत प्रेम रहता है। वह अपनी पत्नी के रूप-लावण्य एवं परस्पर प्रेम के कारण उसे 'प्यारी सदुंरी' नाम से ही संबोधित करता है। कुछ दिन तो सखु -चैन से बीतते हैं, बेराजगारी और बिगड़ती आर्थिक स्थिति  यवुक के मन-मस्तिष्क को बराबर उद्ववग्न करती रहती है। दूसरी ओर गााँव तथा आस-पास के यवुक और अधेड़ उम्र के लोग कृषि-कार्य के अभाव में काम कर कुछ कमाने के लिए  कलकत्ता तथा आसाम आदि पूर्व स्थित राज्यों में जाते-आते रहते हैं और धन बचाकर घर लौट आते हैं। यवुक भी सोचता है
कि वह कलकत्ता जाकर मेहनत-मजदूरी कर कुछ धन कमाए और किर घर लौटकर अपनी पत्नी प्यारी सदुंरी के साथ रहकर मौज-मस्ती करे।
यवुक अपनी पत्नी प् यारी सदुंरी से अपना कलकत्ता जाने का प्रस्ताव रखता है। यवुती आशांकित एवं विचलित हो जाती है। वह इस प्रस्ताव का पुरजोर विरोध करती है। तब वह बहाना बनाकर घर से चुपचाप भाग कर कलकत्ता जाने का मन बना लेता है।
यवुक कलकत्ता पहुाँच जाता है। वहााँ जाकर वह परदेशी 'बिदेसिया' बन जाता है। दिन भर कड़ी मेहनत-मजदूरी कर धन कमाता है।
अचानक उसका परिचय एक यवुती से हो जाता है। यवुती भी  दिनोंदिन उसके पास आती जाती है। उभय पक्ष की आवश्यकता तथा परिस्थिति की नाजुकता के कारण दोनों पति-पत्नी के रूप में रहने लगते हैं। उसे तत्कालीन समाज 'रखैल',
'रखेलीन' या 'रंडी' ही समझता है। बिदेसी दिन भर मजदूरी करता है।शाम को उसी महिला के साथ मौज-मस्ती में रहता है। ताश खेलता है। यवुती खाना बनाती  और मिल-जुल कर चैन से जिंदगी बीतती है।
गााँव में बिदेसी की पत्नी प्यारी सदुंरी को जब यह बोध होता है कि उसका पति बिना उसकी
सहमति के, उसे अकेली छोड़कर कलकत्ता कमाने चला गया, तो उसके भसर पर जैसे विपत्तियोंं का पहाड़ ही टूट पड़ता है। वह दिन-रात कलपती  रहती है। अपने पति के वियोग में तरह-तरह से विलाप करती रहती है। कि उसे अपने पति के साथ रहते समय की घटनाओं की याद आती है,
कि पति का परदेश में क्या हाल होगा, इसको सोच कर विलखती है और कि अपने एकाकीपन
तथा पत्नी-सुलभ कामनाओं के विभूषित हो बिचलित  हो जाती है। उसे दृढ़ विशवास है कि उसका पति अवश्य लौटेगा।
अचानक एक दिन  एक अधेड़ बटोही, जो कमाने के लिए कलकत्ता जा रहा था, बिदेसी की पत्नी प्यारी सदुंरी के विलाप से दयार्ध हो जाता है और उसके कष्ट एवं दखु को समझकर उसके पति को खोजकर वापस भेजने का आश्वासन उसे देता है।
कलकत्ता पहुाँचने के बाद घमू फिरने के क्रम में बटोही की दृष्टि प्यारी सदुंरी के अपने पति के
बताए गए विवरण से मिलते-जुलते एक यवुक पर दृष्टि अचानक पड़ जाती है और बटोही उसे
समझता-बुझाता है, उसकी पत्नी की दारुण दशा का वर्णन करता है तथा उसके अखंडता पतिव्रता की पुष्टि करता है। बिदेसी की स्मृतियां लौट जाती है और वह घर वापस लौटने की बात सोंचने लगता है।
कलकत्ता में पत्नी के रूप में रखी गई महिला  बिदेसी की इस योजना का विरोध करती हैं, किन्तु बटोही के समझाने, डराने और विवश करने पर बिदेसी घर की राह पकड़ता है।
इसी बीच गााँव का एक मनचला यवुक, जिसका आयु बिदेसी से कम है, प्यारी सदुंरी
की परीक्षा लेने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन देता है और बलात्कार करने की चेष्टा करता है।
प्यारी सदुंरी दृढ़ता से प्रतिकार करती है तथा पड़ोसन  के आ जाने के कारण उस का सतीत्व बच जाता है। वह देवर बना मनचला यवुक भाग खड़ा होता है।
इसी समय अपनी दुरावस्था  की स्थिति में बिदेसी अपने घर पहुाँचता है। बहुत विश्वास दिलाने पर और अपने पति की आवाज पहचान कर सदुंरी दरवाजा खोलती है और परदेशी पति को देखकर एक ओर प्रसन्न होती है, तो दूसरी ओर उसकी इस दशा पर स्तंभित हो जाती है। समाचार पछू ने का क्रम पति-पत्नी में चलता है।
इसी बीच बिदेसी के कलकत्ता छोड़कर घर आने की बात सोचकर उसकी  कलकतिया पत्नी और दोनों बच्चे बिदेसी के घर के लिए पूरे  गहने-कपड़े एवं सामान के साथ घर से निकालतेे हैं। कलकत्ता के चोर-डकैत उसके गहने-कपड़े छीन लेते हैं। विपन्नावस्था  में भी  वह महिला अपने दोनों पत्रुों के साथ कलकत्ता से बिदेसी के घर के लिए चल देती है। पूछते - पूछते वह बिदेसी के घर पर पहुाँचती है। बिदेसी उसको देखकर आश्चर्य चकित होता है, किन्तु वह महिला जब प्यारी सदुंरी के साथ रहने
का अननुय- विनय करती है, तो सब मिल-जुल कर रहने लगते हैं।
      🖊️ सुभाष

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