Saturday, 8 December 2018

"मज़हवी फ़रमान में क्यों उलझ रही ज़िन्दगी"


"मज़हवी फ़रमान में क्यों उलझ रही ज़िन्दगी"

अनचाही रफ्तार से भाग रही क्युँ जिंदगी
आस- पास कि कुछ याद ही नहीं जिंदगी

इस भीड़ में किसे तालाश रही ऐ जिंदगी
अपनों से दूर किस आस में है ज़िन्दगी।

जो उमंग पल रही थी, मन में ए ज़िन्दगी
उसे भूल वजूदों में क्या ढूंढ रही ऐ जिंदगी।

फ़िजूल की बातें को क्यों सुन रही है ज़िन्दगी
मज़हवी फ़रमान में क्यों उलझ रही ज़िन्दगी।

नफ़रत के दौड़ में तू शामिल क्यों है ज़िन्दगी
प्यार की परवरिश में तू आगे बढ़ ए ज़िन्दगी।

अपनी मुक़ाम को साकार कर ए ज़िन्दगी
अपने हुनर को सम्मान कर ए ज़िन्दगी।
               
                      ✍️सुभाष कुमार

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