रश्में मोहब्बत भी क्या खूब है।
तहज़ीब की बातें भी क्या खूब है।
मैं,तुम की बातें भी क्या खूब है।
दस्तूर दुनिया भी क्या खूब है।
रश्में समाज भी क्या खूब है।
इनके संस्कार भी क्या खूब है।
मैं, तुम और वादें भी क्या खूब है।
हसरतें मुकाम भी क्या खूब है।
रश्में रिवाज़ भी क्या खूब है।
परवरिशें बंधन भी क्या खूब है।
✍️ सुभाष कुमार

Nice
ReplyDeleteThanks ☺️💐
Deleteक्या खूब लिखा है आपने।🤗
ReplyDeleteशुक्रिया शुक्रिया💐☺️💐
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