शेष-माह की मुस्कान प्रिय
अब्बा की चहकती चिड़िया हो तुम
अम्मा की गुड़िया हो तुम प्रिये
शहर-ए-दिल की गलियाँ हो तुम
ग़ज़ल की दुनिया हो तुम प्रिय
जमाले-ए-दिलफ़रोज़ की सीरत हो तुम
शरद ऋतु की मधुर प्रभा हो तुम प्रिय
दीप तले अंधकार की ज्योति हो तुम
शेष-माह की किरण हो तुम प्रिय
✍️ सुभाष कुमार
(1.जमाले-ए-दिलफ़रोज़:- मनोहर करने वाला सौंदर्य, 2.शेष-माह:- चाँदनी रात।)

बहुत खूब ।
ReplyDeleteआभार शुभम जी💐
Deleteआभार शुभम जी💐
Deleteधन्यवाद
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